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लालची कबूतर

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लालची कबूतर लालची कबूतर एक बार की बात किसी जंगल में एक बढा सा पेड़ था। उस पेड़ पर प्रतिदिन बहुत से पक्षी आकर विश्राम करते थे। एक दिन एक बहेलिये ने पक्षी पकड़ने की इच्छा से वहाँ चावल के दाने फैला दिये और उसके ऊपर जाल बिछा दिया और स्वयं एक पेड़ के पीछे छिपकर बैठ गया । कुछ समय बाद उस पेड़ पर एक कबूतरों का झुण्ड आकर विश्राम करने लगा । तभी उनकी नजर चावलों के दानो पर पड़ी । दाने देखकर उनकी भूख जाग उठी और वह दाने चुगने के लिए जाने लगे। तब उनके मुखिया ने उन्हे समझाया की उसे इन दानों के पीछे कुछ गड़बड़ लग रही है, इसलिए उन्हें यह दानें नहीं चुगने चाहिए। पर कबूतरों ने अपने मुखियाकी बात नहीं सुनीं और दाने चुगने के लिए चले गए। सारे कबूतर जाल में फँस गए। उन्हे अपने मुखिया की बात न मानने तथा लालच करने की सजा मिल गई। उनके मुखिया ने उन्हे एक दिशा में उड़ने के लिए कहा। सब कबूतर जाल के साथ एक ही दिशा में उड़े और बेहलिया देखता ही रह गया । सब कबूतर अपने मुखिया के दोस्त चूहे के घर जा पहुँचे । चूहे ने अपने पैने दांतो से जाल काट कर कबूतरों को मुक्त कर दिया। कबूतरों ने अपने प्राण बचाने वाले नन्हे च...

बादलों की हड़ताल

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बादलों की हड़ताल  एक बार बादलों की हड़ताल हो गई बादलों ने कहा अगले दस साल पानी नहीं बरसायेंगे। ये बात जब किसानों ने सुनी तो उन्होंने अपने हल वगैरह पैक कर के रख दिये लेकिन एक किसान अपने नियमानुसार हल चला रहा था। कुछ बादल थोड़ा नीचे से गुजरे और किसान से बोले क्यों भाई पानी तो हम बरसाएंगे नहीं फिर क्यों हल चला रहे हो? किसान बोला कोई बात नहीं जब बरसेगा तब बरसेगा लेकिन मैं हल इसलिए चला रहा हूँ कि मैं दस साल में कहीं हल चलाना न भूल जाऊँ । अब बादल भी घबरा गए कि कहीं हम भी बरसना न भूल जाएं। तो वो तुरंत बरसने लगे और उस किसान की मेहनत जीत गई। जिन्होंने सब pack करके रख दिया वो हाथ मलते ही रह गए, सो लगे रहो भले ही परिस्थितियां अभी हमारे विपरीत है, लेकिन आने वाला समय निःसंदेह हमारे लिये अच्छा होगा । Moral of the story : - कामयाबी उन्हीं को मिलती है जो विपरीत परिस्थितियों में भी मेहनत करना नहीं छोड़ते हैं। जो पानी से नहाते है वो लिवास बदल सकते हैं। पर जो पसीने से नहाते है। वो इतिहास बदल सकते हैं। 

भावों का चमत्कार

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भावों का चमत्कार एक बार सम्राट श्रेणिक भगवान महावीर के दर्शन के लिए जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने एक मुनिराज को अत्यंत क्रोध की मुद्रा में एक पेड़ के नीचे ध्यान में बैठे हुए देखा। सम्राट श्रेणिक ने उनको वंदन किया और सीधे भगवान महावीर स्वामी के समवसरण में गये और भगवान से मुनिराज के तीव्र क्रोध का कारण और इसका फल जानने की इच्छा रखी। भगवान ने कहा, "श्रेणिक! जिस समय तुम उधर से गुजर रहे थे, वे तीव्र क्रोध में मग्न थे। अगर थोड़ी देर ऐसे ही रहे तो सातवें नरक में जाएंगे। दरअसल बात यह है कि वे एक राजा थे और अपने बच्चे का अबोध अवस्था मे राजतिलक करके वह दीक्षित हो गए थे। उनके दीक्षित होने के बाद उनके मंत्रियों ने छल पूर्वक पूरा राज्य हथिया लिया और उनके बेटे और रानी को देश से निकाल दिया था।" फिर जब राजा श्रेणिक भगवान का धर्मोपदेश सुनकर लौटे तो वहाँ का माजरा देखकर अचंभित हो गए। देखा - महाराज को तो केवलज्ञान हो गया और सब ही देवता उनकी पूजा कर रहे थे। राजा श्रेणिक को देखकर आश्चर्य हुआ कि इनको केवल ज्ञान कैसे हो गया? वो वापस भगवान के पास गए और उन्होंने पूरी बात जानने की चेष्टा भ...

सेठ की खांसी

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                          सेठ की खांसी एक थे सेठजी। खांसी लग गईं उन्हें, परन्तु उन्हें आदत थी खट्टा दही, खट्टी लस्सी, खट्टा अचार और इसी प्रकार की दूसरी वस्तुएं खाने की। जिस वैध जी के पास जाते, वह कहता ये वस्तुएं खाना छोड़ दो, उसके बाद ही चिकित्सा हो सकती है। अंत में एक वैद्य जी मिले। उन्होंने कहा- मैं चिकित्सा करता हूँ आप जो चाहे खाते रहिए । वैद्य जी ने औषधि दी, ये सेठ जी खट्टी वस्तुएं खाते रहे। कुछ दिन के पश्चात मिले तो वैद्य जी से बोले- वैद्य जी ! खांसी बढ़ी तो नहीं परन्तु कम भी नहीं हुई। वैद्य जी ने कहा, आप मेरी दवाई खाते रहिए, खट्टी चीजें भी खाते रहिए। इससे तीन लाभ होंगे। सेठजी ने पूछा कौन-कौन से? वैद्य जी बोले- पहला यह कि घर में चोरी नहीं होगी, दूसरा यह कि कुत्ता कभी नहीं काटेगा, तीसरा यह कि बुढ़ापा कभी नहीं आएगा। सेठजी ने पूछा कैसे ? वैद्य जी ने उत्तर दिया- खांसी हो और खट्टी वस्तुएं खाते रहिए तो खांसी कभी अच्छी नहीं होगी। दिन में खांसोगे और रात में भी, तब चोर कैसे आएगा? और खांस खांसकर हो जाओगे दुर्बल। लाठ...

पागल राजा

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                        पागल राजा राजा की सवारी श्मशान के पास से जा रही थी। तभी उन्होंने देखा एक भिखारी सा आदमी श्मशान के बाहर बैठा है। राजा ने पूछा- तुम नगर में ना जाकर यहां क्यों बैठे हो ? भिखारी बोला राजा ! नगर के सभी लोगों को एक दिन यही आना है, इसलिए मैं पहले से ही यहां आ गया हूं। राजा बोला- तू तो पागल है, जब तेरी बारी आएगी, लोग तुझे अपने आप ही यहां ले आएंगे। भिखारी बोला- तुमको भी यही आना है, एक न एक दिन । राजा बोला- तुम तो वास्तव में घोर पागल हो। ये मेरी मूल्यवान छड़ी है, इसमें हीरे, मोती, पन्ने आदि जड़े हुए हैं। इसे रख लो अपने पास और अगर किसी को देनी हो तो ऐसे आदमी को देना जो तुमसे भी ज्यादा पागल हो। कुछ वर्षों बाद राजा गम्भीर रूप से बीमार हो गया, उसके बचने की आशा नहीं रही। ये भिखारी राजा के पास मिलने पहुंचा बोला - बहुत बीमार हो राजन । राजा ने कराहते हुए कहा- हां, अब तो बचने की आशा भी नहीं, अब तो जाना ही होगा। भिखारी बोला- कहां जाना है ? राजा बोला- यह कैसे मालूम होगा? किसी को पता नहीं तू तो पागलों जैसी तू बात क...

सेठजी का खाना

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                      बुद्धिमान सेठ जी  एक बार शहर के बड़े सेठजी ने हमें खाने पर बुलाया और अपने साथ हमें भी बिठाया। चांदी की थालियों में चांदी की कटोरियां,उनमें भांति-भांति के खाने- हलुवा भी, खीर भी, पूरियां भी, फुलके भी, कितनी ही सब्जियां । हमारी थाली के बाद सेठजी की थाली आई। उसमें पीली सी कोई पतली- सी (द्रव) वस्तु, उसके पास फुला हुआ छोटा सा अनचुपड़ा फुलका । मैंने समझा, सेठजी का असली खाना अभी आएगा, परन्तु वहां तो कुछ भी नहीं आया। सेठजी उसी एक फुलके को धीरे-धीरे खाते रहे, उस पतली-सी वस्तु में प्रत्येक ग्रास को भिगो-भिगोकर । मैंने । पूछा, सेठजी आप खाना कब खाएंगे ? वह बोले- खा तो रहा, हूं। यह फुलका, यह मूंग की दाल का पानी। बस ! इतना ही खा सकता हूँ। मैंने पूछा तो आप दूध अधिक पीते होंगे। वह बोले- नहीं जी, दूध तो मेरे पेट में गैस उत्पन्न कर देता है। मैंने कहा दही, छाछ लेते होंगे? बोले एक बार खाया था छः महीने जुकाम रहा था। मैंने कहा-छुहारे, पिस्ते, बादाम खाते होंगे आप? वह बोले भगवान का नाम लो जी ! ये तो बहुत गर्म वस्तुएं ...

कंजूस बनिए की कहानी

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                      कंजूस बनिए की कहानी  गाँव का एक बनिया शाम को अपनी दुकान से घर आया तो उसने देखा कि दीये की लौ बहुत तेज जल रही है। उसने पत्नी को आवाज दी- अरी ओ भागवान! ये दीये की लौ इतनी तेज क्यों कर रखी है। तू लुटवाकर रहेगी, वैसे ही महंगाई बहुत है । जरा कम कर इसे । इतने में उसे ध्यान आया दुकान का एक ताला शायद वो लगाना भूल गया है। उल्टे पैर भागा दुकान पर। दुकान पर पहुंचा तो पाया दोनों ताले सही सलामत लगे हुए थे । परमात्मा का धन्यवाद किया। वापस घर पहुंचा तो देखा दीये की लौ कम हो चुकी थी । पत्नी से पूछा- दीये की लौ तुमने कम की? जी हाँ, पत्नी बोली । कैसे करी? जी सुई की नोक से करी और किससे करी? और सुई की नोक में जो तेल लग गया होगा उसका क्या, वो तो बेकार गया न? पत्नी बोली- जी मैं आपकी तरह बेवकूफ थोड़े ही हूँ, सुई की नोक पर जो तेल लग गया था उसे मैंने अपने सर में लगा लिया। और खुद को तो देखो जो दुबारा दुकान गए और आये क्या उसमें जूते नहीं घिसते ? पति बोला- मैं भी तेरा पति हूँ, थोड़ी तो अक्ल है मुझ मैं, जूते मैं बगल में दब...

अच्छे लोगों की संगत

                       अच्छे संगत का असर  हकीम लुकमान का पूरा जीवन जरूरतमंदों की सहायता के लिए सर्मिपत था। जब उनका अंतिम समय नजदीक आया तो उन्होंने अपने बेटे को पास बुलाया बेटा पास आ गया तो उन्होंने उससे कहा, 'देखो बेटा, मैंने अपना सारा जीवन दुनिया को शिक्षा देने में गुजार दिया। अब अपने अंतिम समय में मैं तुम्हें कुछ जरूरी बातें बताना चाहता हूं। लेकिन इससे पहले जरा तुम एक कोयला और चंदन का एक टुकड़ा उठाकर ले लाओ।' बेटे को पहले तो यह बड़ा अटपटा लगा, लेकिन उसने सोचा कि अब पिता का हुक्म है तो यह सब लाना ही होगा। उसने रसोईघर से कोयले का एक टुकड़ा उठाया । संयोग से घर में चंदन की एक छोटी लकड़ी भी मिल गयी । वह दोनों को लेकर अपने पिता के पास पहुंच गया। उसे आया देख लुकमान बोले, 'बेटा, अब इन दोनों चीजों को नीचे फेंक दो।' बेटे ने दोनों चीजें नीचे फेंक दी और हाथ धोने जाने लगा तो लुकमान बोले, 'जरा ठहरो, बेटा। मुझे अपने हाथ तो दिखाओ।' बेटे ने हाथ दिखाए तो वह उसका कोयले वाला हाथ पकड़ कर बोले, "देखा तुमने । कोयला पकड़ते ही हाथ काला हो गया। ल...

संगत का असर

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                              संगत का असर प्राचीन काल में एक संत दूसरे गांव जाने के क्रम में अपने एक शिष्य के साथ एक गांव में कुछ दिनों को लिए रुके। गांव के लोग संत के पास अपनी समस्याएं लेकर पहुंचने लगे। संत बहुत विद्वान थे। वे अपनी बुद्धि से सभी परेशानियों को दूर करने रास्ता बता देते थे। कुछ ही दिनों संत की प्रसिद्धि पूरे क्षेत्र में फैल गयी। संत रोज प्रवचन भी देते थे। उनके उपदेश सुनने के लिए गांव में दूर-दूर से लोग आने लगे। संत की बढ़ती प्रसिद्धि को देखकर गांव के एक पुजारी को जलन होने लगी। वह सोचने लगा कि इस तरह तो उसके भक्त भी संत के पास पहुंचने लगेंगे। पुजारी जलन की वजह से संत को शत्रु मानने लगा था। पुजारी ने संत की छवि खराब करना शुरू कर दिया। वह गांव के लोगों को कहने लगा कि ये संत पाखंडी है और लोगों मूर्ख बना रहा है। पुजारी के कुछ साथी भी इस काम में उसका साथ दे रहे थे। एक दिन संत के शिष्य ने गांव में अपने गुरु की बुराई सुनी तो वह क्रोधित हो गया। शिष्य तुरंत ही गुरु के पास पहुंचा और गांव में हो रह...

दो दोस्त और भालू

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दो दोस्त और भालू एक दिन दो युवा दोस्त राम और श्याम ने जंगल जाने का फैसला किया, और किसी भी खतरे के खिलाफ एक-दूसरे की मदद करने का वादा भी किया। अचानक जंगल के रास्ते में एक भालू ने उन पर हमला कर दिया। राम जल्दी से दौड़ा और एक पेड़ पर चढ़ गया, दूसरी ओर श्याम के पास पर्याप्त समय नहीं था। बचने के लिए वह जमीन पर लेट गया, जैसे वह मर गया हो । भालू तेजी से आगे बढ़ा और श्याम के पास आया, और ऐसा लगा जैसे भालू राम के कान में फुसफुसा रहा हो। श्याम ने अपनी सांस रोककर रखा और कुछ देर बाद भालू चला गया। राम पेड़ से नीचे आया और पूछा श्याम भालू ने आपके कान में क्या फुसफुसाया श्याम ने जवाब दिया भालू ने मुझे स्वार्थी दोस्तों से दूर रहने के लिए कहा जो खतरे के समय भाग जाते हैं। नैतिक शिक्षा : हमें भगवान की योजना में विश्वास रखना चाहिये।

मूर्ख बिल्लियाँ

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मूर्ख बिल्लियाँ एक बार एक बिल्ली ने सड़क पर रोटी का एक टुकड़ा पड़ा देखा। एक और बिल्ली ने भी देखा। और दोनों एक ही समय में उस पर झपट पड़े। बिल्लियाँ लड़ने लगीं । कुछ समय बाद पहली बिल्ली ने सुझाव दिया कि वे रोटी को दो बराबर टुकड़ों में बांट लें। इसी बीच एक बंदर वहां आ गया। बिल्ली ने बंदर से रोटी को दो बराबर भागों में बांटने को कहा। बंदर बहुत चालाक था। उसने रोटी को दो टुकड़ों में बांट दिया और उनके आकार की जांच की लेकिन एक टुकड़ा दूसरे से बड़ा था, इसलिए उसने बड़े टुकड़े से काट लिया और खुद ने कहा लिया। फिर उसने देखा कि दूसरा टुकड़ा बड़ा था और उसने उससे भी काट लिया और फिर से बचा हुआ टुकडा खा लिया। वह कुछ देर तक ऐसे ही चलता रहा और आखिर में उसने सारी रोटी खा ली, और बिल्लियों के पास कुछ भी नहीं बचा। नैतिक शिक्षा : मूर्ख वह है जो दूसरे मूर्ख पर भरोसा करता है।

खुनी झील की कहानी

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                   खुनी झील का कहानी  एक बार की बात है एक जंगल में एक झील थी। जो खुनी झील के नाम से प्रसिद्ध थी। शाम के बाद कोई भी उस झील में पानी पिने के लिए जाता तो वापस नहीं आता था। एक दिन चुन्नू हिरण उस जंगल में रहने के लिए आया।लेकिन उस झील में मगरमच्छ क्या कर रहा है। उसे तो हमनें कभी नहीं देखा। इसका मतलब वह मगरमच्छ ही सभी जानवरों को खाता है जो भी शाम के बाद उस झील में पानी पिने जाता है।लेकिन उस झील में मगरमच्छ क्या कर रहा है। उसे तो हमनें कभी नहीं देखा। इसका मतलब वह मगरमच्छ ही सभी जानवरों को खाता है जो भी शाम के बाद उस झील में पानी पिने जाता है। अगले दिन जग्गू बन्दर जंगल के सभी जानवरों को ले जाकर उस झील में गया। मगरमच्छ सभी जानवरों को आता देखकर छुप गया। लेकिन मगरमच्छ की पीठ अभी भी पानी से ऊपर दिखाई दे रही थी। सभी जानवरों ने कहा की यह पानी के बाहर जो चीज़ दिखाई दे रही है वह मगरमच्छ है। यह सुनकर मगरमच्छ कुछ नहीं बोला। चीकू खरगोश ने दिमाग लगाया और बोला नहीं यह तो पत्थर है। लेकिन हम तभी मानेंगे जब यह खुद बताएंगा। यह सुन...